Cloud Seeding यानी “कृत्रिम वर्षा” एक ऐसी तकनीक है जिसके ज़रिए हम बादलों में कुछ रसायन छोड़कर बारिश करवाने की कोशिश करते हैं। जब प्राकृतिक बारिश नहीं होती या बहुत कम होती है, तब इस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है।
इसका सबसे ज़्यादा उपयोग सूखा प्रभावित क्षेत्रों में पानी की कमी दूर करने, और प्रदूषण से राहत के लिए किया जाता है। हाल ही में, दिल्ली सरकार ने भी 2025 में इसे लागू करने की तैयारी की है।
Cloud Seeding kaise kaam karta hai?
Cloud Seeding ka process bahut hi scientific hai:
- बादलों का चुनाव – पहले उन बादलों को चुना जाता है जिनमें नमी (moisture) होती है और जो बारिश की क्षमता रखते हैं।
- Chemical Spray – फिर हवाई जहाज या ड्रोन के ज़रिए बादलों में Silver Iodide, Potassium Iodide या Dry Ice का छिड़काव किया जाता है।
- Condensation – ये रसायन पानी की छोटी-छोटी बूंदों को मिलाकर बड़ी बूंदें बनाते हैं।
- Rainfall – जब ये बूंदें भारी हो जाती हैं, तो बारिश के रूप में ज़मीन पर गिरती हैं।
भारत में Cloud Seeding की ताज़ा खबरें (2025)
दिल्ली सरकार की पहल
दिल्ली सरकार ने प्रदूषण से निपटने और बारिश लाने के लिए क्लाउड सीडिंग ट्रायल्स को मंज़ूरी दी है:
- प्रोजेक्ट का बजट: ₹3.21 करोड़
- संख्या: 5 ट्रायल्स
- लॉन्च: मई-जून 2025 तक
- Technology Partner: IIT Kanpur
- Target Area: 100 वर्ग किलोमीटर
इस तकनीक से उम्मीद की जा रही है कि दिल्ली के प्रदूषण स्तर में गिरावट आएगी और वायुमंडल साफ होगा।
Cloud Seeding aur Natural Rain में फर्क
| मापदंड | Natural Rain | Cloud Seeding (Artificial Rain) |
|---|---|---|
| प्रक्रिया | स्वाभाविक वातावरणीय प्रक्रिया | मानव निर्मित, रसायन के उपयोग से |
| जरूरत | आद्र्रता, तापमान, वायुदाब सही होना | सिर्फ बादल और न्यूनतम नमी चाहिए |
| नियंत्रण | प्रकृति के हाथ में | इंसान नियंत्रित कर सकता है (कुछ हद तक) |
Cloud Seeding के फायदे
- प्रदूषण कम करता है
हवा में मौजूद धूल और जहरीले कण बारिश से नीचे गिर जाते हैं। - सूखे से राहत दिलाता है
खासतौर पर महाराष्ट्र, राजस्थान जैसे इलाकों में जहां बारिश की कमी रहती है। - कृषि को सपोर्ट करता है
फसलों को सही समय पर पानी मिलने से पैदावार अच्छी होती है। - जल संकट कम कर सकता है
तालाब, झील और भूमिगत जल स्रोतों में पानी की भरपाई हो सकती है।
Cloud Seeding के नुकसान और चुनौतियाँ
- हर मौसम में कारगर नहीं – अगर बादल ही नहीं हैं तो सीडिंग नहीं हो सकती।
- लागत ज़्यादा है – एक बार का ट्रायल ही लाखों रुपए में होता है।
- रसायनों का असर – Silver Iodide जैसे रसायन लंबे समय तक पर्यावरण में रह सकते हैं, हालांकि इसका प्रभाव अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
- स्थायी समाधान नहीं – ये सिर्फ टेम्परेरी राहत है, मूल कारणों (जैसे प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग) का इलाज नहीं।
Cloud Seeding किस मौसम में सफल रहता है?
- सबसे अच्छा समय होता है जब बादल मौजूद हों और नमी ज्यादा हो।
- मॉनसून या पोस्ट-मॉनसून सीजन (जुलाई से अक्टूबर) इस तकनीक के लिए आदर्श माने जाते हैं।
क्या Cloud Seeding से बाढ़ आ सकती है?
अगर इसका प्रयोग नियंत्रित मात्रा में और वैज्ञानिक गाइडलाइंस के अनुसार किया जाए तो बाढ़ का खतरा नहीं होता।
हालांकि uncontrolled या लगातार प्रयोग से ज्यादा बारिश की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।
भारत में अब तक कहाँ-कहाँ हुआ है Cloud Seeding?
| वर्ष | राज्य | उद्देश्य |
|---|---|---|
| 2003 | कर्नाटक | सूखा प्रभावित क्षेत्र में पानी लाना |
| 2016 | महाराष्ट्र | विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्र में बारिश |
| 2025 | दिल्ली | प्रदूषण कम करना और कृत्रिम बारिश |
Cloud Seeding का भविष्य भारत में
भारत जैसे देश में जहां प्रदूषण, सूखा और जल संकट आम समस्याएँ हैं, वहां Cloud Seeding एक बेहद उपयोगी तकनीक बन सकती है।
हालांकि इसे मुख्य समाधान नहीं बल्कि सहायक तकनीक के रूप में देखा जाना चाहिए।
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)
Q.1: क्या Cloud Seeding से पक्की बारिश होती है?
नहीं, ये बादलों की स्थिति और मौसम पर निर्भर करता है।
Q.2: क्या यह तकनीक सुरक्षित है?
अब तक कोई गंभीर दुष्प्रभाव सामने नहीं आए हैं, लेकिन नियंत्रित और सीमित प्रयोग ज़रूरी है।
Q.3: क्या सभी जगह ये काम करता है?
नहीं, ये उन्हीं जगहों पर कारगर है जहां बादल पहले से मौजूद हों।
निष्कर्ष (Conclusion)
Cloud Seeding एक आधुनिक विज्ञान आधारित तकनीक है जो भारत में जल संकट, प्रदूषण और कृषि की समस्याओं के लिए एक उपयोगी टूल बन सकती है।
हालांकि इसके लिए वैज्ञानिक प्लानिंग, पर्यावरणीय संतुलन और लागत का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।
दिल्ली सरकार की यह पहल एक सकारात्मक संकेत है कि भारत विज्ञान की मदद से नई ऊंचाइयाँ छूने की ओर बढ़ रहा है।
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